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बुधवार, 24 दिसंबर 2008

ख़ुद को मिटाया था जब सोचा था किसी को पा लेंगे
मगर ख़ुद को मिटाकर भी उसको ना पा सकें
वो मेरा कभी हुआ ही नही मुझको भी अपना बनाया नही
इस कांच से नाज़ुक रिश्ते को उसने कभी अपनाया ही नही
फिर क्या हो उस कोशिश का जो मैं हमेशा करती रही
तुझको पाने की कोशिश में ख़ुद को भी भुलाती रही

यादें

आजकल यादों के पन्ने फिर उखड़ने लगे हैं
हर पन्ने पर एक गहरी याद कुच्छ याद दिलाती है
हम इन यादों को फिर से जीने लगे हैं
आइना बन कर हर याद सामने आ जाती है
और हम इन यादों के समुन्दर में गोते खाने लगे हैं
दिल में यादों के भंवर हैं बड़े गहरे
हम तो इनमें फिर से डूबने लगे हैं
यादों को फिर से जीना इतना आसां नही होता
न जाने कितनी मौत मरकर जिया जाता है

मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

राहुल गाँधी के नाम

आज के अख़बार हिंदुस्तान में मैंने एक ख़बर पढ़ी की राहुल गाँधी एक दलित सुनीता के घर गए उसके बच्चों के पास पहनने को कपड़े भी नही थे और पिता कपड़े इसलिए पह्न्ताथा ताकि बच्चे भूख से न मरें और वो कुछ काम कर ला सके .........मगर मैं कहती हूँ कि वो बच्चे यदि भूख से न भी मरे तो सर्दी से मर जायेंगे ,मुसीबत तो तब भी कम नही हुयी उनके सिर से.............मेरा दिल सुबह से उसी बारे में सोचे जा रहा है ...................क्या हम उनके लिए कुछ नही कर सकते .............आज हमारा देश nuclear पॉवर बन गया है मगर हमारी जनता आज भी वहीँ उसी नरक में जी रही है ...................क्या राहुल गाँधी ने इस मुद्दे को उठाया....................क्या उनके लिए कुछ किया...........हो सकता है किया हो मगर और भी न जाने कितनी सुनितायें और उनके बच्चे इससे भी बुरी हालत में जी रहे हैं.....................उनके लिए उन्होंने क्या सोचा...............................हो सकता है कुछ सोचा हो और करना चाहते हों मगर क्या जो वो करना चाहते हैं वो उन तक पहुँच पायेगा .............इसका कोई इंतजाम किया उन्होंने.......................मेरी एक राय है ................क्यूँ नही राहुल देश की हर माता बहन से एक अपील करते कि उन गरीबों के लिए कुच्छ सोचें ......................वैसी ही अपील जैसी अभी देल्ही विधानसभा चुनावों में हुयी थी की वोट देना जरूरी है वरना पप्पू कहलाओगे ....................टीवी के मध्यम से बिल्कुल उसी प्रकार जैसे वोटिंग के लिए की उनके लिए भी करें ............क्या गरीबी की रेखा से ऊपर रहने वाले लोगों में इतनी भी दया या vivek नही होगा की वो इस अपील को समझ पाएं ...................उदाहरण के लिए ..........अगर आज इतनी बड़ी आबादी में से कम से कम २०-२५ करोड़ लोग तो ऐसे होंगे ही जो इस पर ध्यान दें .............अगर उनसे कहा जाए हर घर एक कपड़ा अपने घर से उनके लिए दो जिन्हें इतना भी नसीब नही की वो तन ढँक सकें तो क्या कोई इस पर ध्यान नही देगा.......................हर इन्सान उनके लिए कुछ न कुछ करना चाहेगा और इससे करीबन इतने ही दलितों को एक छोटी सी सहायता से तन ढंकने को कपड़ा नसीब हो जाएगा..............हर गृहिणी उनके लिए कुछ न कुछ देना चाहेगी क्यूंकि हम अपने न जाने कितने ही कपड़े मन से उतर जाते हैं तो छोड़ देते हैं तो क्या एक पहल उनके लिए नही कर पाएंगे ..................राहुल आज के युवा हैं उनसे ये उम्मीद है की वो इस दर्द को समझते हैं और इस सब के लिए कुछ ऐसा करेंगे जिससे वो सब उन्ही को मिले जिनके लिए किया गया है न की आज के भ्रष्ट नेता या अफसर उसे हड़प लें .............एक अपील ऐसी एक बार अगर वो कर दें तो सारी जनता उनका साथ देने को तैयार हो जाए ..........बस एक कोशिश , एक पहल की जरूरत है...................तभी देश की असली तरक्की है ।
जो कोई भी इस लेख को पढ़े कृपया आगे प्रेषित करे ।

क्यूँ

क्यूँ हर बार नारी को ही अग्निपरीक्षा देनी पड़ी
क्यूँ हर बार नारी के सर ही हर दोष मढा गया
क्यूँ हर बार उसके हर निर्णय का अपमान किया गया
क्यूँ हर बार पुरूष के दंभ का शिकार बनी
हर अच्छाई का श्रेय नर को ही क्यूँ
क्यूँ हर बुराई का ठीकरा हर बार
नारी के ही सर फोड़ा गया
क्या उसका कोई अस्तित्व नही
क्या वो कोई इन्सान नही
क्या फर्क है नारी और नर में
क्या नारी का यूँ तिरस्कार कर
पुरूष सफलता पायेगा
क्या इतने से ही उसका
पोरुष संबल पा जाएगा
जब शक्ति बिना शक्तिमान
कार्य नही कर पाता है
तो फिर बता ए नर
तू उससे तो बड़ा नही
क्यूँ समझ नही पता है
नारी बिना नर का भी अस्तित्व नही

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008

आओ एक बार फिर से एक कोशिश करके देखें

तुम क्यूँ नही पढ़ पाए मेरा मन आज तक
मैं तो हर मोड़ पर सिर्फ़ तुम्हें ही देखती रही
तुम्हारे लिए जीती रही तुम्हारे लिए मरती रही
मन का सफर तय करना इतना मुश्किल तो न था
इतना वक्त साथ गुजारने के बाद ,उम्र के इस मोड़ पर
अब भी मैं वो ही हूँ फिर तुम क्यूँ बदल गए
मेरे मन में आज भी वहीँ उमंगें हैं
वही अरमान हैं,वही चाहतें हैं
तुमने उन्हें कहाँ दफ़न कर दिया
आज फिर से वो ही पल
हम क्यूँ नही जी पाते
माना वक्त सब कुछ बदल देता है
मगर मन तो हमारा वो ही रहता है
क्यूँ हम एक ही बिस्तर पर पास होकर भी
मन से दूर हुए जाते हैं
क्या ज़िन्दगी ऐसे ही जी जाती है
कब तक हम अपने अपने
विचारों में गुम एक दूसरे से दूर
अपनी अपनी सोचों में जिए जायेंगे
क्यूँ नही तुम मुझे पढ़ पाते हो
क्या मेरी सदाएं तुम तक पहुंच नही पाती हैं
या फिर तुम सब जानते हो
और तुम भी अपनी ही दुनिया में
कहीं खोये जाते हो
क्यूँ हम अब एक दूसरे से
अपने जज़्बात बाँट नही पाते हैं
क्या उम्र इसी तरह दगा देती है
मुझे पता है कि दोनों तरफ़
प्यार की कोई कमी नही है
फिर भी मन क्यूँ बंटते जा रहे हैं
हम तो दोनों दो जिस्म एक जान हैं
फिर कहाँ से आया ये तूफ़ान है
आओ इस तूफ़ान को मिटा दें
अपने मन को एक बार फिर से मिला लें
अपने अपने मन को एक दूसरे में कुछ ऐसे
डुबो दें कि फिर कोई तूफ़ान
इन्हें जुदा कर न सके
आओ एक बार फिर से
एक कोशिश करके देखें
एक बार फिर से
एक कोशिश करके देखें

बुधवार, 17 दिसंबर 2008

पत्थर

ता-उम्र पत्थरों को पूजा
पत्थरों को चाहा
ये जानते हुए भी
पत्थरों में दिल नही होता
पत्थरों के ख्वाब नही होते
पत्थरों में प्यार नही होता
कोई अहसास नही होता
पत्थरों को दर्द नही होता
कोई जज़्बात नही होते
फिर भी पत्थरों को ही
अपना खुदा बनाया
पत्थरों की चोट खा-खाकर
पत्थरों ने ही
हमको भी पत्थर बनाया
हर अहसास से परे
पत्थर सिर्फ़ पत्थर होते हैं
जो चोट के सिवा
कुछ नही देते

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

मुझमें न ढूंढ मुझे
राख के ढेर में अब
कोई चिनगारी नही
उम्र भर
इक चिता जलती रही
लकडियाँ कम पड़ गयीं
तो अरमान सुलगते रहे
जब कुछ न बचा
तो राख बन गई
बरसों से पड़ी है ये
कोई इसे भी उठाने न आया
अब तो इस राख पर भी
वक्त की धूल जम गई है
इसे हटाने में तो
जन्मों बीत जायेंगे
फिर बताओ
कहाँ से ,कैसे
मुझे मुझमें पाओगे
दिल चाहता है मूक हो जायें
सिर्फ़ धडकनों की धडकनों से बात हो
चहुँ ओर फैली खामोशी में
दिल के साज़ पर
धडकनों का संगीत बजता हो
कुछ इस तरह
धड़कने धडकनों में
समां जायें
तू , तू न रहे
मैं , मैं न रहूँ

रविवार, 14 दिसंबर 2008

मुझे मुझसे मिला गया कोई

दिल के सोये तारों को जगा गया कोई
मुझे मुझसे फिर मिला गया कोई
फिर एक बार तमन्ना है जगी
फिर एक बार महफिल है सजी
यादों को गुलजार कर गया कोई
दिल की हर धड़कन को भिगो गया कोई
सोये अरमानों को आइना दिखा गया कोई
कुछ इस तरह एक बार फिर
मुझे मुझसे मिला गया कोई

शून्य से शून्य की ओर

शून्य से शून्य की ओर जाता ये जीवन
कभी न भर पाता ये शुन्य
पैसा, प्यार, दौलत ,शोहरत
कितना भी पा लो फिर भी
शून्यता जीवन की
कभी न भर पाती
हर पल एक भटकाव
कुछ पाने की लालसा
क्या इसी का नाम जीवन है
हर कदम पर एक शून्य
राह ताकता हुआ
शून्य स शुरू हुआ ये सफर
शून्य में सिमट जाता है
जीवन की रिक्तता
जीवन भर नही भरती
और हम
शून्य से चलते हुए
शून्य में सिमट जाते हैं
अब जी नही करता
किसी के कंधे पर
सिर रख रोऊँ मैं
कोई मेरा हाथ थामे
मुझे अपना कहे
अब जी नही करता
किसी के दिल मैं जगह मिले
कोई प्यार करे मुझे
अब जी नही करता
सिर्फ़ जिस्मानी रिश्ते हैं
जो जिस्मों तक बंधे हैं
सब झूठ लगता है
इसलिए
अब जी नही करता
किसी के दामन का
सहारा लूँ मैं
किसी को अपना बना लूँ मैं
एक कांटा चुभा दिल में
आह भी निकली
दर्द भी हुआ
मगर
हर सिसकी जैसे
रेत में पड़ी बूँद
की मानिन्द
कहीं खो गई
मैंने दर्द का बगीचा लगाया
जिसमें ग़मों के बीज बोए
ज़ख्मों से सींचा उसको
अब तो नासूर रूपी फूलों से
हरी भरी है बगिया मेरी

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008

फूल का दर्द

क्यूँ उदास है वो फूल बाग़ का,शायद किसी का इंतज़ार है उसे
क्यूँ खिलते हैं ये फूल बाग़ में,शायद किसी पथिक की थकन उतरने के लिए
ये देते हैं शांती आंखों को,दिए जाते हैं उपहार में
मगर किसी ने पूछा फूल से उसके उत्पन्न होने का सबब
यूँ तो लगते हैं सेहरे में भी फूल और चढाये जाते हैं अर्थी पर भी
पर क्या बीतती है उस लम्हा दिल पर फूल के
न जानना चाहा इसका सबब किसी ने
यूँ तो डाली से तोडा जाता है और फेंकने के बाद कुचला भी जाता है
क्या गुजरी,कितने ज़ख्म बने दिल पर फूल के,न समझ सका कोई
हर किसी ने निकला मतलब अपना अपना इससे
मगर न पूछा किसी ने की तुझे दर्द कहाँ है
रोते हैं ये फूल भी मगर न देखा रोना इनका किसी ने
अगर सुनना है फूलों का रुदन तो ख़ुद फूल बन जा
ये शायद खिलते और मुरझाते हैं दूसरों को सुकून देने के लिए
कर देते हैं अपनी ज़िन्दगी बलिदान खुशियों पे सभी की
अगर कुच्छ पाना या खोना है तो सिख फूलों से
जो लेते हैं गम और खोते हैं अपना रंग रूप
और फिर भी रहते हैं सदा मुस्कुराते
काँटों में है दर्द का अथाह सागर
इतना दर्द कैसे समेटा है अपने में
लोग कांटा लगने पर देते हैं गाली
मगर हमें तो प्यार आता है काँटों पर ही
काँटों पर प्यार आता है इसलिए
हमने और काँटों ने सहा है सिर्फ़ दर्द
आहटों से मुलाक़ात न करो
आहटें तो सुनाई देती हैं सिर्फ़ दूर से
खामोशियों ने छुपा रखा है हर आहट को अपने में
खामोशियों में ही सुन सकते हैं आहटों को
मगर हर कोई नही
आहटों की बात है बहुत प्यारी
खामोशियों में ही बात करो
खामोशी में ही खामोशी से मुलाक़ात करो
ज़िन्दगी तुम्हें आहटों से दूर
खामोशियों के समीप मिल जायेगी

मंगलवार, 9 दिसंबर 2008

किसी ने कुच्छ कहा नही
फिर भी हमने सुन लिया
बिना कहे भी बात होती है
उसको कभी देखा नही
फिर भी हमने देख लिया
बिना देखे भी मुलाक़ात होती है
कभी कभी किसी को जाने बिना
हम जान लेते हैं ,पहचान लेते हैं
कुच्छ ऐसे नाते होते हैं
जो कभी अपने नही होते
फिर भी अपने से लगते हैं
कुच्छ रूहों को
न देखने की न जानने की
न पहचानने की
न अपनेपन की जरूरत होती है
यह तो जन्मों के नाते होते हैं
जो दिलों से बंधे होते हैं

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

तलाश जारी है

तलाश जारी है
हर किसी की
न जाने किसे
ढूंढ रहे हैं सब
हर कोई
कुछ  न कुछ
पाना चाहता है
जब मिल जाता है
तब फिर एक बार
कुछ  नया पाने की
चाहत में
तलाश शुरू करता है
फिर एक बार
एक अंतहीन
दिशा की ओर
चलने लगता है
और उसकी
यह तलाश
ता-उम्र जारी रहती है
किसी को खोजने
की तलाश
कुछ  पाने की
तलाश
मगर
तलाश है कि
कभी ख़त्म नही होती
मृत्यु के उस पार भी
उसकी यह
तलाश जारी रहती है
जब तक
ख़ुद को नही पाता
तब तक
तलाश जारी रहती है
ख़ुद को
पाये बिना
कोई तलाश
पूरी नही होती
और तब तक
तलाश जारी रहती है

शुक्रवार, 21 नवंबर 2008

कुच्छ तो कहें
किसी से तो कहें
दिल की बातें
यूँ ही हर किसी से
तो नही कही जाती
कुच्छ बातें
सिर्फ़ दिल से ही
की जाती हैं
कहने को तो
बहुत कुच्छ
होता है
मगर..........
किस से कहें
इसका जवाब ही
नही मिल पाता है
कुच्छ कहना
चाहकर भी
दिल कुच्छ
नही कह पाता है
इस बेबसी को सिर्फ़
वो दिल ही जान पाता है
जो कुच्छ कहने
और न कहने की
उलझन में
उलझता जाता है

शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

मैं ख़ुद को ढूंढ रही हूँ
हर महफिल में ,हर वीराने में
हर नुक्कड़ पर,हर मोड़ पर
बस ख़ुद को ढूंढ रही हूँ

खोज

मन की सुनसान राहों पर
कुछ खोजना चाहते हैं
किसी को पाना चाहते हैं

मगर

क्या यह डगर इतनी आसां हैं
क्या वो हमें मिलेगा
जिसे हम खोजने चले हैं

काश
इतना आसां होता ?

अपने अस्तित्व को मिटा कर
किसी को खोजा जाता हैं

ख़ुद को मिटा कर ही
ख़ुद को पाया जाता हैं

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

सपनों को पूरे होते देखना और उनके साथ जीना ,यह अहसास सिर्फ़ वो ही महसूस कर सकता है जिसने उनके साथ वो लम्हे बिताये हों। सच ज़िन्दगी में हर सपना पूरा होता है मगर अपने वक्त पर,वक्त से पहले नही । हम कभी कभी वक्त से पहले कुच्छ सपनों को पूरा करना चाहते हैं मगर ऐसा नही हो सकता क्यूंकि हर काम का इक वक्त होता है। ज़िन्दगी हर सपना पूरा करती है बस हमें ही सब्र नही होता। अगर हम में कुच्छ धैर्य हो तो क्या है वो चीज़ जिसे हम पा न सकें। अपने सपनो में तो हम ता-उम्र डूबते उतरते रहते हैं मगर जब वो पूरे होते हैं तो उस अहसास को हम चाहकर भी नही बाँट पाते क्यूंकि जिसकी चाहत होती है वो ही उसे समझ सकता है दूसरा कोई नही इसलिए सपने बाँट नही सकते और न ही उन्हें पाने की खुशी ।
इक सपना देखा था मैंने
हर पल आंखों में पलते
उस सपने को पंख भी दिए
परवाज़ भी दी उसे
अब सिर्फ़ एक हवा के झोंके की जरूरत थी
वो भी आया न मालूम कहाँ से
और वो सपना जो सपना था
वो हकीकत बन गया

शनिवार, 1 नवंबर 2008

जिसे खोजती हूँ गली गली
मुझी में छुपा है वो कहीं
यह जानती हूँ मगर
फिर भी उसे सामने
ला नही पाती
कैसे ढूँढूं ,किस्से पता मीले
कोई तो मिला दे मुझे
मेरे श्याम से
एक दर्श दिखा दे
नैना तरस रहे हैं
एक झलक को
कैसे मिलोगे
कुच्छ तो बताओ
कभी सपने में ही आ जाओ
कहाँ तुम्हें पाऊँ में
अब तो बता जाओ
जान पर बन रही है
मिलने की तड़प भारी है
कोई तो बताये कहाँ खोजूं
कैसे तुम्हें खोजूं
कहाँ मिलोगे
कब मिलोगे
कैसे मिलोगे
अब तो हार गई हूँ
अब आ के संभल लो

रविवार, 19 अक्तूबर 2008

दीवाली है मन के दीप जलाओ
इन दीपो से जग को जगमग करो
माटी के दीप तो बुझ जाते हैं
मन के दीप तो हर दिल में
ता-उम्र जलते हैं
चलो कुच्छ ऐसा कर जायें
मन के दीपो की एक माला बनाएं
कुच्छ अपने जैसे लोगों के दिल में
खुशियों के दीप जलाएं

सोमवार, 22 सितंबर 2008

कोई हो ऐसा

कभी कभी हम चाहते हैं कि
कोई हो ऐसा जो
हमारे रूह कि
अंतरतम गहराइयों में छिपी
हमारे मन कि हर
गहराई को जाने
कभी कभी हम चाहते हैं कि
कोई हो ऐसा जो
सिर्फ़ हमें चाहे
हमारे अन्दर छीपे
उस अंतर्मन को चाहे
जहाँ किसी कि पैठ न हो
कभी कभी हम चाहते हैं कि
कोई हो ऐसा जो
हमें जाने हमें पहचाने
हमारे हर दर्द को
हम तक पहुँचने से पहले
उसके हर अहसास से
गुजर जाए
कभी कभी हम चाहते हैं कि
कोई हो ऐसा जो
बिना कहे हमारी हर बात जाने
हर बात समझे
जहाँ शब्द भी खामोश हो जायें
सिर्फ़ वो सुने और समझे
इस मन के गहरे सागर में
उठती हर हिलोर को
हर तूफ़ान को
और बिना बोले
बिना कुच्छ कहे
वो हमें हम से चुरा ले
हमें हम से ज्यादा जान ले
हमें हम से ज्यादा चाहे
कभी कभी हम चाहते हैं
कोई हो ऐसा.......कोई हो ऐसा

बुधवार, 17 सितंबर 2008

टूटे हुए महल अरमानों का कफ़न ओढे खड़े हैं शायद अब भी किसी के इंतज़ार में । हर पत्थर खंडहर का अपनी कहानी कह रहा है , उसके चेहरे पर आंसुओं के निशान अब भी देखे जा सकते हैं। मगर उन्हें पढने वाली आँखें हैं कहाँ-----यहीं ढूंढ रहे हैं ।
लाश का कोई अरमान नही होता
वो तो सिर्फ़ लाश है
उसे किसी का इंतज़ार नही होता
लाश में प्यार की प्यास नही होती
दर्द का अहसास नही होता
चेतना अवचेतना का ग्यान नही होता
जो अपने हैं उनका भान नही होता
कुच्छ बन गए हैं कुच्छ बन जायेंगे
हम लाश समान
एक सड़ती हुयी लाश को
कोई क्यूँ अपनाएगा
उससे हमदर्दी तो दूर
कोई पास भी न आएगा
इसी तरह इस लाश को ढोते ढोते
अपनों के अहसास से बहुत दूर
चले जायेंगे हम
हमसफ़र साथ होते हुए भी तनहा हूँ मैं
ज़िन्दगी इससे बड़ी और क्या सज़ा देगी हमें

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

मेरे आँगन में न उतरी धूप कभी
तब कैसे जानूं उसकी रौशनी है क्या
न बुन सकी कभी तमन्नाओं के धागे
न जोड़ सकी यादों के तार कभी
न जला सकी प्यार के दिए कभी
इस डर से की अंधेरे और न बढ़ जायें
माना नही ठहरती धूप किसी भी आँगन में
मगर मेरे आँगन में तो धूप की एक
छोटी सी किरण भी न उतर सकी
भला कैसे जानूं मैं किस तरह
खिला करती है धूप आँगन में
एक परछाईं हूँ ,न जाने कब गुम हो जाऊँ,
न करो इससे प्यार,एक छलावा हूँ,सिर्फ़ छलना जानती हूँ,
मुझे पकड़ने की दौड़ में कहीं तुम बहुत आगे न निकल आना
ज़माना साथ न दे सकेगा,तुम्हें ही पीछे जाना पड़ेगा,
एक साया सा हूँ मुझे छूने की कोशिश न कर,
कहीं ऐसा न हो ,तुम्हारा अपना साया ही
तुम्हारा साथ न छोड़ दे ।
आसमान पर लगे हैं हम तारों की तरह
न जाने किस दिन टूट कर गिर जायें






हो चुकी है रहगुजर कठिन
मुश्किल से मिलेंगे नक्शे कदम
वक्त की आंधियां चलीं कुच्छ इस कदर
कि हम झड़ गए ड़ाल से सूखे हुए पत्तों की तरह
हर आँचल हो पाक ये जरूरी तो नही
हर आइना हो साफ़ ये जरूरी तो नही
हर फूल में हो खुशबू ये जरूरी तो नही
हर खुशी हो अपनी ये जरूरी तो नही
हर अपना हो अपना ये जरूरी तो नही
इसलिए
हर चेहरा हो खिला ये जरूरी तो नही

मंगलवार, 9 सितंबर 2008

मेरी मुस्कराहट तो एक ऐसा दर्द है
जो छुपाये बनता न दिखाए बनता





हर तरफ़ ये तूफ़ान सा क्यूँ है
हर इन्सान परेशां सा क्यूँ है
हर जगह ये सन्नाटा सा क्यूँ है
ये शहर भी वीरान सा क्यूँ है
क्या फिर किसी का दिल टूटा है
क्या फिर कोई बाग़ उजड़ा है
क्या फिर किसी का प्यार रूठा है
क्या फिर कोई नया हादसा हुआ है
शायद फिर से खंडहर बन गया है कोई
या ग़मों के हर दौर से गुजर गया है कोई
हर सितम सहूंगी उसके ये इकरार करती हूँ
इसे बेबसी कहूं या क्या कहूं,क्यूंकि
मैं उससे प्यार करती हूँ
जो गम दिए हैं मेरे देवता ने
मैं उनका आदर करती हूँ
उस सौगात का अनादर नही कर सकती,क्यूंकि
मैं उनकी पूजा करती हूँ
पुजारिन हूँ तुम्हारी में
बस इतना चाहती हूँ
मेरे मन मन्दिर में मेरे देवता
हर पल हर दिन बसे रहना
नही मांगती तुमसे कुछ मैं
मुझसे पूजा का अधिकार न लेना
दुनिया के कोलाहल से दूर
चरों तरफ़ फैली है शांती ही शांती
वीरान होकर भी आबाद है जो
अपने कहलाने वालों के अहसास से दूर है जो
नीरसता ही नीरसता है उस ओर
फिर भी मिलता है सुकून उस ओर
ले चल ऐ खुदा मुझे वहां
दुनिया के लिए कहलाता है जो शमशान यहाँ
उदास नज़र आता है हर मंज़र
नज़र आता नही कहीं गुलशन
हर तरफ़ क्यूँ उदासी छाई है
या फिर मेरे दिल में ही तन्हाई है
हर शय ज़माने की नज़र आती है तनहा
समझ आता नही ज़माने की उदासी का सबब
वीरान सा नज़र आता है हर चमन
या फिर मेरी नज़र में ही वीरानी छाई है
उड़न ज़िन्दगी की है कहाँ तक
प्यार ज़िन्दगी में है कहाँ तक
शायद
ज़िन्दगी है जहाँ तक
लेकिन
ज़िन्दगी है कहाँ तक
नफरत की सीमा शुरू हो
शायद वहां तक
प्यार की सीमा ख़त्म हो
शायद वहां तक

सोमवार, 8 सितंबर 2008

हम तो ता-उम्र तुझ में ख़ुद को ढूंढते रहे
सुना था
प्यार करने वाले तो दो जिस्म एक जान होते हैं
क्या पता था
ये सिर्फ़ कुच्छ लफ्ज़ हैं

गुरुवार, 4 सितंबर 2008

लोग न जाने कैसे किसी के दिल में घर बना लेते हैं
हमें तो आज तलक वो दर -ओ-दीवार न मिली
लोग न जाने कैसे किसी के प्यार में जान गँवा देते हैं
हमें तो आज तलक उस प्यार का दीदार न मिला
लोग न जाने कैसे काँटों से दोस्ती कर लेते हैं
हमें तो आज तलक दर्द के सिवा कुच्छ भी न मिला
लोग न जाने कैसे जानकर भी अनजान बन जाते हैं
हमें तो आज तलक कोई अनजान भी न मिला
ज़ख्म कितने दोगे और यह तो बता दो
अब तो दिल का कोई कोना खाली न बचा
हाल-ऐ-दिल तो क्या तुम समझोगे मेरा
जब तेरे दिल के किसी कोने में जगह ही नही
किसी की चाहत में ख़ुद को मिटा देना बड़ी बात नही
गज़ब तो तब है जब उसे पता भी न हो
वो आज तक कुच्छ सुन नही पाया
जो हम उससे कभी कह न पाये
दिल के कुच्छ अरमान
शब्दों के मोहताज़ नही होते
कुच्छ वाकये तो नज़रों से बयां होते हैं
कोसी ने कर दिया
अपनों को अपनों से
कोसो दूर
अब के बिछडे
फिर न मिलेंगे कभी
ज़ख्म रूह के
फिर न भरेंगे कभी
हालत पर दो आंसू गिराकर
सियासत्दार फिर न
मुड़कर देखेंगे कभी
उजडे आशियाँ
फिर भी बन जायेंगे
पर मन के आँगन
फिर न भरेंगे कभी

बुधवार, 3 सितंबर 2008

जिस्मों से बंधे जिस्मों के रिश्ते
रूह का सफर कभी तय कर नही पाते
जो रिश्ते रूह में समां जाते हैं
वो जिस्मों की बंदिशों से आजाद होते हैं

सोमवार, 1 सितंबर 2008

ज्वार भाते ज़िन्दगी को कहाँ ले जायें पता नही
ज़िन्दगी भी कब डूबे या तर जाए पता नही
बस ज्वार भाते आते रहते हैं और आते रहेंगे
न पूनम की रात का इंतज़ार करेंगे
न अमावस्या की रात का
बस ज़िन्दगी इन्ही ज्वार भाटों के बीच
कब डूबती या समभ्लती जायेगी पता नही

शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

कभी कभी कुछ लफ्ज़ दिल को ज़ख्म दे जाते हैं
कभी कभी मरहम भी दर्द का सबब बन जाती है
कब कौन आ के कौन सा ज़ख्म उधेड़ दे ,क्या ख़बर
कभी कभी दुआएं भी बद्दुआ बन जाती हैं
तस्वीर का रुख बनाने वाले को भी न समझ आया
कभी कभी आईने भी तस्वीर को बदल देते हैं

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

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4:11:00 AM by vandana
जब जिंदगी में भागते भागते हम थकने लगते हैं ,मन उदा...

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3:38:00 AM by vandana
virhan का दर्द



8/6/08 by vandana
virhan का दर्द savan क्या jane कैसे katate हैं दिन...

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8/6/08 by vandana
virhan का दर्द savan क्या jane कैसे katate हैं दिन...

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8/6/08 by vandana
virhan का दर्द savan क्या jane कैसे katate हैं दिन...

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8/6/08 by vandana
virhan का दर्द savan क्या jane कैसे katate हैं दिन...

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8/6/08 by vandana
भीगा सावन



8/4/08 by vandana
गर किसी को मीले मेरा पता



8/1/08 by vandana
कश्ती



7/30/08 by vandana
तड़प



7/29/08 by vandana
एक कतरा खुशी



7/29/08 by vandana
सिसकते ज़ख्म



7/24/08 by vandana
ख्याल



7/23/08 by vandana
हर गम में एक खुशी छुपी है हर रात में एक दिन छुपा ह...



7/13/08 by vandana
टूटा दिल



7/13/08 by vandana
इंतज़ार खुशियों का



7/3/08 by vandana
कहीं बहुत गहरे कुछ चुभ सा गया है हमने भी चाहा कोई ...



6/20/08 by vandana
आहत हो जाती है वो जब कोई दुत्कार देता है हर किसी ...


1 comment 6/19/08 by vandana
अहसास



6/14/08 by vandana
हर गम दुनिया में सभी को नसीब नही होता कोई चाहने वा...

draft

6/14/08 by vandana
खामोश निगाहों की जुबान हैं आंसू, दिल पर किसी ज़ख्म ...



6/13/08 by vandana
मेरा घर



6/10/08 by vandana
विरानियाँ हैं घर मेरा tanhaiyan हैं sathi और गम है...

draft

6/10/08 by vandana
दर्द -ऐ - दिल


2 comments 6/8/08 by vandana

बुधवार, 6 अगस्त 2008

virhan का दर्द

virhan का दर्द sawan क्या जाने
कैसे कटते हैं दिन और कैसे कटती हैं रातें
बदल तो आकर बरस गए
चहुँ ओर हरियाली कर गए
मगर virhan का सावन तो सुखा रह गया
पीया बीना अंखियों से सावन बरस गया
सावन तो मन को उदास कर गया
बीजली बन कर दिल पर गिर गया
कैसे सावन की फुहार दिल को जलाती है
इस दर्द को तो एक virhan ही जानती है
virhan का दर्द savan क्या jane
कैसे katate हैं दिन और कैसे katati हैं ratein
badal to aakar बरस गए
chahun ore hariyali कर गए
मगर virhan का sawan to sukha रह गया
पिया बिना ankhiyon से sawan बरस गए

मंगलवार, 5 अगस्त 2008

भीगा सावन

बरखा की फुहारों ने तन मन भीगो दीया
सावन की बहारों ने मौसम बदल दीया
ऐसे भीगे मौसम ने कुछ याद दीला दीया
वो बचपन में बारीश में भीगना
वो सखियों के संग बारीश में नाचना
फिर हर पल मस्ती में झूमना
आज भी उन्ही पलों के लिए तरसना
हर लम्हा यादों में फिर जींदा कर दिया
हर सावन में बारीश की फुहारों में
उन्ही पलों को यादों में फिर से जीना
बचपन की याद दीला गया
हमको हमारे बचपन से मीला गया

शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

गर किसी को मीले मेरा पता

मन की घुटन अश्कों में बह नही पाती
शब्दों में बयां हो नही पाती
अजीब मुकाम पर है जिंदगी
जो रुक् पाती हैमन की घुटन अश्कों में बह नही पाती
शब्दों में बयां हो नही पाती
अजीब मुकाम पर है जिंदगी
जो रुक् पाती है
और
आगे चल पाती है
यादों के बवंडर में घीर गई है जिंदगी
ख़ुद को ढूंढ रही हूँ
जाने कहाँ खो गई हूँ
जीसमें ख़ुद को खो दीया
उसे तो पता भी चला
मैं उसके लिए कुछ नही
मगर वो मेरे लिए सब कुछ है
मेरा din,मेरी रात
मेरी खुशी ,मेरा गम
मेरा हँसना मेरा रोना,
मेरा प्यार मेरी लडाई
मेरा दोस्त,मेरा परिवार,
मेरा आज, मेरा कल,
मेरा आदी , मेरा अंत,
उसके बीना अस्तीत्व ही नही मेरा
उसके बीना जिंदगी की कल्पना ही नही
अब ऐसे में कहाँ खोजूं अपने आप को
जहाँ खुदी को मिटा दीया मैंने
उसमें ख़ुद को समां दीया मैंने
वहां कैसे अलग करुँ ख़ुद को
मुझे मेरा 'मैं' कहीं मीलता नही
अपने आप से पल पल लड़ रही हूँ मैं
अपना पता पूछ रही हूँ मैं
गर किसी को मीले तो बता देना
मुझे मुझसे मिला देना
और
आगे चल पाती है
यादों के बवंडर में घीर गई है जिंदगी
ख़ुद को ढूंढ रही हूँ
जाने कहाँ खो गई हूँ
जीसमें ख़ुद को खो दीया
उसे तो पता भी चला
मैं उसके लिए कुछ नही
मगर वो मेरे लिए सब कुछ है
मेरा din,मेरी रात
मेरी खुशी ,मेरा गम
मेरा हँसना मेरा रोना,
मेरा प्यार मेरी लडाई
मेरा दोस्त,मेरा परिवार,
मेरा आज, मेरा कल,
मेरा आदी , मेरा अंत,
उसके बीना अस्तीत्व ही नही मेरा
उसके बीना जिंदगी की कल्पना ही नही
अब ऐसे में कहाँ खोजूं अपने आप को
जहाँ खुदी को मिटा दीया मैंने
उसमें ख़ुद को समां दीया मैंने
वहां कैसे अलग करुँ ख़ुद को
मुझे मेरा 'मैं' कहीं मीलता नही
अपने आप से पल पल लड़ रही हूँ मैं
अपना पता पूछ रही हूँ मैं
गर किसी को मीले तो बता देना
मुझे मुझसे मिला देना

बुधवार, 30 जुलाई 2008

कश्ती

तूफानों को सीने में दबाये रहते हैं
हर पल भंवर में फंसे रहते हैं
आदत सी हो गई है अब तो
डूब डूब कर पार उतरने की
यह कश्ती है जज्बातों की
आंसुओं का अथाह सागर है
भावनाओं के तूफानों में
कश्ती जिंदगी की बार बार
तूफानों से लड़ते हुए
कभी भंवर में फंसते हुए
तो कभी बाहर नीकलते हुए
साहील तक पहुँचती है

मंगलवार, 29 जुलाई 2008

तड़प

जिंदगी कहाँ तडपाती है यह तो ख़ुद तड़पती है
इसे कोई क्या समझेगा यह तो ख़ुद नासमझ है
जिंदगी हमें रुलाती नही यह तो ख़ुद रोती है
इसे कोई क्या जलाएगा यह तो ख़ुद को जलाती है
इसे कोई दर्द देगा क्या यह तो ख़ुद दर्द में जीती है
जिंदगी खामोश करती नही यह तो ख़ुद खामोश होती है
यह इम्तिहान लेगी क्या यह तो ख़ुद इम्तिहान देती है
इससे मोहब्बत कोई क्या करेगा यह तो ख़ुद मोहब्बत की मारी है
जिंदगी किसी को क्या कहेगी यह तो ख़ुद बेजुबान होती है
इसे कोई क्या समझेगा यह तो ख़ुद नासमझ है

एक कतरा खुशी

खुशी मिलती है कभी कभी
समेट लो दामन में हर पल
कल न जाने क्या हो
यहाँ पल की ख़बर नही
एक छोटा सा कतरा खुशी का
जीने का सबब बन जाता है
ज्यादा की तमन्ना में
न मायूस करो इनको
यह हाथ में आती हैं कभी कभी
इसे यादों में जज्ब कर लो

गुरुवार, 24 जुलाई 2008

सिसकते ज़ख्म

कभी कभी ऐसा भी होता है
हर ज़ख्म सि्सक रहा होता है
दवा भी मालूम होती है
मगर इलाज ही नही होता है
हर जख्म के साथ कोई याद होती है
एक दर्द होता है ,एक अहसास होता है
मगर फिर भी वो लाइलाज होता है
तन्हाइयाँ कहाँ तक ज़ख्मों का इलाज करें
इन्हें तो आदत पड़ गई है दर्द में जीने की
रोज ज़ख्मों को उधेड़ना और फिर सीना
नासूर बना देता है उन ज़ख्मों को
और नासूर कभी भरा नही करते
इनका इलाज कहीं हुआ नही करता

ख्याल

आज ख्यालों से नीकलकर ख्यालों ने मुझसे बात की
हर जज्बे को बयां किया हर हाल की बात की
कुच्छ अपनी सुनाई कुछ हमारी सुनी
अपनी खामोशियों को दिखाया अपने दर्द को दिखाया
जो जो न हम जानते थे वो भी बताया
अजब वो समां था जहाँ सिर्फ़
हम थे और हमारे ख्याल थे
ख्यालों ने हमें ख्यालों में रहने को कहा
गर कर दिया बयां तो फिर जीने को क्या रहा
इस तरह कुच्छ हमने अपने ही ख्यालों से
उनके जज्बातों को जाना
ख्यालों से ख्यालों की मुलाक़ात भी अजब थी

सोमवार, 14 जुलाई 2008

हर गम में एक खुशी छुपी है
हर रात में एक दिन छुपा है
हर शाम में एक सुबह छुपी है
हर ख्वाब में एक हकीकत छुपी है
फिर क्यूँ नही हम
उस खुशी से ,उस सुबह से ,
उस दिन से ,उस हकीकत से,
रु-बी-रु नही हो पाते
क्यूँ नही उसे खोजते
क्यूँ नही पाना चाहते
क्यूँ हमेशा दर्द के साये में
हमेशा जीना चाहते हैं ?

टूटा दिल

जब ख्वाब टूटता है तब नया ख्वाब बुनते हैं हम
जब अरमान टूटते हैं तब नए अरमान जागने लगते हैं
जब उम्मीद टूटती है तब नई उम्मीद फिर जगती है
हर बार कुच्छ न कुच्छ खोकर भी
कुच्छ न कुच्छ पाने की आशा जनमती है
मगर
जब दिल टूटता है तब ..................
न उम्मीद बचती है
न ख्वाब सजते हैं
न उम्मीद बंधती है
क्यूँकी
दिल के टूटने पर
नया दिल कहाँ से लायें ?
एक दिल लिए फिरते हैं हम
वो भी कब टूट जाता है
पता ही नही चलता

गुरुवार, 3 जुलाई 2008

इंतज़ार खुशियों का

हर सुबह इंतज़ार रहता है एक खुशी का
जब भी उठते हैं एक अनदेखी खुशी को
पाने की चाहत में इंतज़ार करते हैं
सपनो का बुनना शुरू करते हैं
ख्वाबों में जीना शुरू करते हैं
ख्यालों में पाने की तमन्ना होती है
दिल इसी अहसास में खुश रहता है
मगर,
जब शाम आती है ,
हर उम्मीद नाउम्मीदी में तब्दील होने लगती है
ख्वाब टूटना शुरू हो जाते हैं
सपने बिखरने लगते हैं
और दिल को यह समझाने लगते हैं
ऐसा भी होता है ------ऐसा भी होता है
रात होते होते एक बार फिर
एक नई सुबह का फिर से इंतज़ार करते हैं
फिर से नए ख्वाब बुनने के लिए
सपनो को पूरा करने के लिए
कुच्छ इस तरह
एक नई सुबह के इंतज़ार में
एक अनदेखी खुशी के इंतज़ार में
हम जिंदगी गुजार देते हैं

शुक्रवार, 20 जून 2008

इसलिए बहुत गहरे कुछ चुभ सा गया है

कहीं बहुत गहरे कुछ चुभ सा गया है
हमने भी चाहा कोई सिर्फ़ हमें प्यार की हद तक चाहे
मगर प्यार सब का नसीब नही होता
चाहत पैदा तो नही की जा सकती
शायद हम ही न थे इस काबिल किसी की चाहत बन सकते
प्यार की किस्मत में सिर्फ़ रुसवाई ही होती है
कोई होता जो सिर्फ़ हमें चाहता
सिर्फ़ हमें................
उसके आगे रिश्ता न चाहता
मगर किसी की चाहत के काबिल बनना आसान नही होता
इसलिए बहुत गहरे कुछ दरक गया है
कांच से भी नाजुक है जो
ऐसे दिल को कैसे कोई समझाए
सब कुछ मिला इसे मगर
सिर्फ़ दिल को चाहने वाला न मिला
कुछ अपनी कहने वाला
कुछ इसकी सुनने वाला न मिला
इसलिए बहुत गहरे कुछ चुभ सा गया है

गुरुवार, 19 जून 2008

आहत हो जाती है वो जब कोई दुत्कार देता है

आहत हो जाती है वो जब कोई दुत्कार देता है
हर किसी के लिए जीती है और मरती है
कभी उफ़ नही करती फिर भी न जाने क्यूँ
हर किसी की निगाह में कसूरवार होती है
कोई जुर्म न करके भी हर सज़ा भोगती है वो
ख़ुद को तबाह करके भी कुछ नही पाती है वो
प्यार के दो लफ्जों को तरसती है वो
कभी बहन बनकर तो कभी पत्नी बनकर
कभी बेटी बनकर तो कभी माँ बनकर
पल पल मरती है वो
हर लम्हा सिसकती है वो
क्या कभी मिल पायेगी उसे अपनी हस्ती
क्या कभी ख़ुद को दिला पायेगी सम्मान वो
एक ऐसे समाज में जो हर पल बदलता है?
नारी आज भी वहीँ है जहाँ पहले थी
उसकी जगह आज भी वहीँ है जहाँ पहले थी
हर किसी की नज़र आज भी वैसी ही है जैसी पहले थी
कहीं कुछ नही बदला और न ही कभी बदलेगा
यह समाज जैसा है वैसा ही रहेगा
नारी का जीवन भी जैसा था वैसा ही रहेगा

शनिवार, 14 जून 2008

अहसास

हर गम दुनिया में सभी को नसीब नही होता
कोई चाहने वाला दिल के करीब नही होता
मुस्कुराते हम भी हर महफ़िल में ज़माने की
गर किसी का दिया दर्द दिल के करीब नही होता

यह कहाँ ले आई तकदीर आज मुझे
की अपना साया भी आज नज़र आता नही
किसी और को अब क्या चाहेंगे
जबकि अपने आप को भी चाह जाता नही


हर सुबह मेरी अँधेरी हो गई
हर शाम मेरी कहीं खो गई
कहाँ गए वो मदमस्त दिन
खो गया कहीं अल्हड़पन
ज़िंदगी मेरी गम की शाम हो गई
हर रात मेरी परेशां हो गई
यूं तो होती हूँ हर वक्त ही तनहा
फिर भी तन्हाई मेरी तनहा हो गई


दिल जो एक बार टूटा टूटता ही चला गया
तेरा प्यार जो मुझसे rootha तो toothta ही चला गया


ऐ खुदा मेरे हिस्से की सब खुशी उन्हें दे दे
उनके हिस्से के सभी गम मुझे दे दे
मेरे नसीब की महफिलें हों उन्हें नसीब
उनके नसीब की तन्हैयाँ भी मुझे दे दे

तनहाइयों की महफिलें सज़ा लेंगे हम
वीरानियों में दिल बहला लेंगे हम
मगर तुझसे खुशी न मांगेंगे कभी
अपनी हर खुशी भी तुझपे लुटा देंगे हम
तेरे नाम पे यह ज़िंदगी लुटा देंगे हम
ऐसी मौत को हंसकर गले लगा लेंगे हम

ग़मों का काफिला है पीछे मेर यह पता है उसे
फिर भी जहाँ का हर गम दे गया है मुझे

मुझे ज़िंदगी मिली आंसू बनकर
हर गम मिला ज़ख्म बनकर
बेरुखी मिली दर्द में ढलकर
प्यार भी मिला तो नफरत बनकर

दूरियां इतनी न बढाओ की फिर पास न आ सकें
गर पास आयें तो नज़रें मिला न सकें
नज़रें मिला भी लें तो एक दूसरे को अपना भी न सकें
इसलिए तोड़ दो यह बंधनों की दीवार,जिसके पार हम जा सकें

ज़िंदगी तड़प रही थी किसी की
मौत हंस रही थी उसकी
ज़िंदगी ने चाह मिल जाए मौत ही
मगर उसने भी साथ न दिया ज़िंदगी का
कितनी मजबूर थी ज़िंदगी जीने के लिए
तड़प के आगोश में जलने के लिए

बहुत तरसा था यह दिल तनहाइयों के लिए कभी
अब घेरा है तन्हैयेओं ने इस कदर की फुरसत नही महफिलें सजाने की

शुक्रवार, 13 जून 2008

खामोश निगाहों की जुबान हैं आंसू,
दिल पर किसी ज़ख्म का निशाँ हैं आंसू,
यूं टू हसरतों के जज्ब होने का नाम हैं आंसू,
फिर भी आँख से न dhalakne का नाम हैं आंसू।



उदास आंखों से आंसू नही गिरते हैं,
यह टू मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं।



दर्द में मैंने जिसको भी करीब पाया था
आंसू बहता वो मेरा ही साया था



काँटों भरी राह का बाम है ज़िंदगी,
दर्द में सिमटी हर शाम का नाम है ज़िंदगी,
नफरतों के जहाँ में हंसने का नाम है ज़िंदगी,
दिन के उजालों में जलने का नम है ज़िंदगी,
रात के वीरानों में भटकने का नाम है ज़िंदगी,
असल में फूलों से बचकर चलने का नाम है ज़िंदगी।


बहारों का आँचल नही है हर किसी के लिए
पतझड़ का दमन नही है हर किसी के लिए
बहारों में फूल खिलते हैं,दिल भी मिलते हैं
फिर कभी न मिलने के लिए,पतझड़ में दिल बिचादते एन।


ऐ अश्कों जज्ब हो जाओ आखों की कोरों में
तुम्हें नही दी इजाज़त बाहर निकलने की ज़माने ने।


ज़ख्म कागज़ पर लिखकर , दर्द दिल का मिटा लेते हैं
अपनी तकदीर से रु-बी-रु होकर ख़ुद को जीने की सज़ा देते एन।


डूब गया हूँ ग़मों में कुछ इस कदर
की दरिया-ऐ-जिंदगानी अब पार नही होती
मैं टू वो माझी हूँ जिसे तलाश है एक कश्ती की
और यह तलाश है की ख़त्म नही होती।

दिल के टूटने की चटख बहुत दूर तक गई
मगर आवाज़ सुनने वाला रह में कोई न था


दिल की आवाज़ सुन रही थी में
खामोश वातावरण में जी रही थी में
न जाने यह कैसा तूफ़ान आ गया
भा में ज़िंदगी की कश्ती फंस गई है
न डूब रही है और न निकल रही है
साहिल भी साथ है मगर किनारे की तलाश है



आज ज़िंदगी बन गई है ऐसा पिंजरा
जिसमें बंद पंछी पंख फद्फादा भी नही सकता

जीने की इच्छा हो चुकी है ख़त्म
सिर्फ़ जीने की रस्म निभाए जा रही हूँ मैं
हँसी का रंग भी बदल चुका है अब
सिर्फ़ खोखले अंदाज़ मैं हँसे जा रही हूँ में
दिल से टू टूट चुकी थी बहुत पहले ही
अब टू और टूटने के लिए जिए जा रही हूँ में

मंगलवार, 10 जून 2008

मेरा घर

विरानियाँ हैं घर मेरा
तन्हैयाँ हैं साथी
और गम हैं पड़ोसी
दिल कभी परेशां कैसे हो
जब ऐसा सुखद साथ हो
कोई खुशी दमन को छुए कैसे
जब हर तरफ़ रंजो गम की बरसात हो
मेरे घर में हमेशा दर्द का पहरा रहता है
अश्कों से हमेशा दामन भीगा रहता है

यह तो वो हरियाली है
जो कभी मुरझाती नही
ऐसी ब्हार है जो
आकर कभी जाती नही

रविवार, 8 जून 2008

दर्द -ऐ - दिल

दिल के टूटने की आवाज़ वो सुनकर भी नही सुनता ,
सब कुछ समझ कर भी वो कुछ भी नही समझता,
किसी के दिल पर क्या बीती है ----वो जानता है ,
इतना भी नासमझ नही ------फिर क्यों वापस बुलाता नही ,
दर्द जब हद से बढ़ जाएगा वो तब भी न वापस आएगा ,
जब हम न रहेंगे -------यह जानकर भी ,
वो हमको न वापस बुलाएगा।

इन्सान

आज इन्सान सिर्फ़ अपनी सोच और अपने लिए ही जीता है । उसे फर्क नही पड़ता की कोई क्या सोचता है । उसे किसी की चाहत से कोई मतलब नही । अपने लिए जीना और सिर्फ़ अपने मन की सुनना और करना सिर्फ़ इतना चाहता है। क्या यही है ज़िंदगी की सच्चाई?कहीं कोई प्यार नही,किसी की इच्छा का सम्मान नही। रिश्ते भी सिर्फ़ अपनी जरुरत के लिए नीभाना फिर भूल जाना.........क्या यही इंसान है? क्यों इन्सान की सोच इतनी मतलबी हो गई है ?

kyun

मौसम क्यों रंग बदलता है ,ज़िंदगी क्यों हर पल बदलती है,
ज़ख्म क्यों बार बार मिलते हैं ,दिल क्यों बार बार टूटता है,
दिल क्यों नही pratirodh कर पाता ,अश्क क्यों जज्ब हो जाते हैं ,
वक्त क्यों बदलता नही , किस्मत को तरस क्यों आता नही ,
क्यों ख़ुद को समझ पाते नही ,क्यों किसी को समझा पाते नही ,
क्यों यह ग़मों का मौसम ठहर गया है ,इसे दूसरा घर क्यों नज़र आता नही ।

शनिवार, 7 जून 2008

दर्द

मैंने दर्द को भी आहें भरते देखा है
हर गम को भी मुस्कुराते देखा है
हर सुबह में एक उदासी देखी है
हर शाम में एक खुशी भी देखी है
हर चुभते कांटे में एक दर्द को पलते देखा है
हर खामोश nigaah में एक आंसू को जलते देखा है
हर खामोश दीवार में kisi राज़ को दफ़न देखा है
हर मासूम चेहरे में एक खामोश मुहब्बत देखी है
पर हर मुहब्बत को परवान पे न चढ़ते देखा है
इस बेदर्द duniya को हर आह पर हँसते देखा है
हर ज़ख्म को यहाँ sirf नासूर बनते देखा है
मैंने दर्द को भी आहें भरते देखा है

बुधवार, 28 मई 2008

पहचान औरत की

क्या औरत की ज़िंदगी हमेशा काँटों भरी ही रहेगी?हर औरत एक मुकम्मल जहाँ चाहती है मगर क्या उसे कभी mil पाता है उसका जहाँ?क्यों हर बार उसके साथ ही ऐसा क्यों होता है?एक औरत को उसका घर कभी नही milta चाहे क्यों न उसे सारी umra घर की मालकिन कहा जाए मगर क्या वास्तव में वो कभी घर की मालकिन बन पाती है?
आज हर जगह कम या ज्यादा औरत की यही हालत है.उसे हर जगह यही अहसास करवाया जाता है की वो एक औरत है तो चाहे पित के घर रहे या pita के हर काम के liye आज भी औरत को यही ahssas करवाया जाता है की जब वो अपने घर चली जाए तब जो चाहे करे मगर उसे ta-umra यह समझ नही आता की उसका घर कौन सा है kyunki pita कहते हैं की अपने pati के घर जो चाहे करना और जब pati के घर हो तो वो कहते हैं की pita के घर यह kiya कभी .ऐसे में कोई बताये की औरत का घर कौन सा है?क्या उसकी अपनी कोई शख्सियत नही होती ?आज भी कितना ही पढ़ लिख जाए मगर उसके नसीब में औरत होने का ठप्पा उसे कुच्छ भी अपनी मरजी से न करने के लिए क्यों मजबूर करता है?आज दुनिया चाहे कहीं भी पहुँच गई हो मगर इंसान की सोच आज भी वो ही है.purush आज भी नही बदला . उसकी सोच और उसकी मानसिकता आज भी वैसी ही है जैसी पहले थी .ऐसे में कैसे औरत ख़ुद को समाज में sthapit करे ?लोग कह सकते हैं की अपने हक के liye लड़े अपनी बात कहे मगर एक औरत का दर्द सिर्फ़ एक औरत ही समझ सकती है .आज औरत को घर और बाहर सब देखना होता है और अपनी गृहस्थी भी .ऐसे में अगर वो अपने हक के liye लड़ती है तो घर छूटता है जिसके liye उसने सारी ज़िंदगी दे दी और न लड़े तो hashra वोही होता है जो है आज भी .तो ऐसे में वो क्या करे,क्या कभी इस purushmay समाज में क्या कभी उसे भी वो मुकाम मिल पायेगा जिसकी वो हक़दार है?

मंगलवार, 27 मई 2008

जीने का ढंग

जीना सीखना है तो फूल से सीख , सब kucchh सहना और हँसते रहना ,
हर सुबह काँटों की गोद में आँखें खोलना और phir भी मुस्कुराते रहना ,
कभी उफ़ भी न करना ,आह भी न भरना ,हर ज़ख्म पर मुस्कुराते रहना ,
क्या kismat पाई है ------- dard सहकर भी सबको मुस्कान देना ,
हर चाहत को दूसरे की खुशी में jazb कर देना ,
अपने dard का kisi को अहसास भी न होने देना,
रात भर काँटों के bistar पर गुजारना ,
और fir अगली सुबह वो ही मुस्कराहट होठों पर सजा कर रखना ,
आसान नही होता ..................................................................
सीख सके तो सीख जीने का ढंग ,
सहने का ढंग ,मुस्कुराने का ढंग ,
सबको खुशीयाँ बाँटने का ढंग

सोमवार, 26 मई 2008

अभिव्यक्ति

aasan नही होता ख़ुद को abhivyakt करना
न जाने kitni बार ख़ुद से ही लड़ना पड़ता है
न जाने kitni बार gir gir कर संभलना पड़ता है
हर मोड़ पर एक नया फ़साना होता है
जहाँ हर कोई बेगाना होता है
क्या ऐसे में कभी ख़ुद को abhivyakt कर सकते हैं
जब ऐसी राहें हो जहाँ चलना mushkil हो

हर बार अनजानी disha हो ,अनजानी manzil
मुझे पता भी न चले कहाँ जा रही हूँ मैं
तब ख़ुद को कैसे पाऊँगी और abhivyakt कर पाऊँगी